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रिलीज से पहले आमिर ख़ान की 'लाल सिंह चड्ढा' और अक्षय कुमार की 'रक्षा बंधन' का क्यों हो रहा विरोध, जाने वजह
 
Entertainment News

हिंदी फ़िल्मों के दो बड़े स्टार आमिर ख़ान की 'लाल सिंह चड्ढा' और अक्षय कुमार की 'रक्षा बंधन' अगले हफ़्ते की 11 तारीख़ को रिलीज़ हो रही है.

हालांकि सोशल मीडिया पर लोग अलग-अलग वजहों से इन दोनों ही फ़िल्मों के बहिष्कार की मुहिम चला रहे हैं. लेकिन बहिष्कार की इन मुहिम का वाक़ई कोई असर हो पा रहा है?

इस सप्ताह सोशल मीडिया पर 'लाल सिंह चड्ढा' और 'रक्षा बंधन' फ़िल्म ट्रेंड कर रही है. कई लोग न केवल इन दोनों फ़िल्मों बल्कि इन दोनों कलाकारों और बॉलीवुड के भी बहिष्कार की मांग कर रहे हैं.

सोशल मीडिया ट्रेंड्स को देखने से पता चलता है कि बॉलीवुड और इसके दर्शकों के आपसी संबंध बदल रहे हैं. हालांकि जानकारों के अनुसार बहिष्कार की इन अपीलों से हिंदी फ़िल्म जगत को कितना नुक़सान हो पाएगा, ये बता पाना अभी मुश्किल है.

2020 में आई कोरोना महामारी के चलते महीनों तक सिनेमाहॉलों के बंद रहने से हुए भारी नुक़सान से बॉलीवुड अभी उबर नहीं पाया है. यही नहीं उसके बाद जब सिनेमा हॉल खुले भी तो एक के बाद एक कई फ़िल्में फ़्लॉप हो गईं.

लाल सिंह चड्ढा में आमिर ख़ान और करीना कपूर

बॉलीवुड की इन परेशानियों के बीच दक्षिण भारत की कई फ़िल्मों ने हिंदी दर्शकों के सहारे तगड़ी सफलता हासिल की. इसे देखते हुए इस इंडस्ट्री के कई जानकारों ने बॉलीवुड के भारी संकट में पड़ने का अनुमान जताया है.

लाल सिंह चड्ढा, हॉलीवुड अभिनेता टॉम हैंक्स के अभिनय वाली मशहूर फ़िल्म 'फॉरेस्ट गम्प' का रूपांतरण है. वहीं रक्षा बंधन में अक्षय कुमार ने चार बहनों की ज़िम्मेदारी उठाने वाले भाई की भूमिका निभाई है. इन दोनों ही फ़िल्मों पर काफ़ी पैसे और उम्मीदें दांव पर लगी हैं.

सोशल मीडिया पर दक्षिणपंथी विचारधारा के लोग, इन दो फ़िल्म स्टारों या इन फ़िल्मों से जुड़े अन्य लोगों के पुराने बयानों को लेकर निशाना साध रहे हैं और उन्हें 'भारत विरोधी' या 'हिंदू विरोधी' क़रार दे रहे हैं.

मई 2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद अल्पसंख्यकों पर कथित रूप से बढ़े हमलों और देश में बढ़ी 'धार्मिक असहिष्णुता' पर आमिर ख़ान ने कहा था कि उन्हें भी पिछले 6 या 8 महीनों से महसूस हो रहा है कि भारत में 'असुरक्षा' और 'भय' का माहौल बढ़ रहा है.

उन्होंने तब की अपनी पत्नी किरण राव के बारे में बताया था कि किरण ने उन्हें ऐसे माहौल में देश छोड़ देने की सलाह दी.

अपने इन बयानों के बाद आमिर ख़ान 2015 में हिंदूवादियों के निशाने पर आ गए थे. हालांकि आमिर ख़ान ने उस बयान को संदर्भ से अलग काटकर देखे जाने का आरोप लगाया. उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपना बचाव करते हुए भी कहा कि वे भारत को बहुत प्यार करते हैं.

इस हफ़्ते आमिर ख़ान ने कहा कि वे इस बात से 'दुखी' हैं कि लोग सच में यक़ीन करते हैं कि वे भारत को पसंद नहीं करते.

मीडिया से बातचीत में आमिर ख़ान ने कहा, ''मैं हर किसी को यक़ीन दिलाना चाहता हूँ कि ऐसी बात नहीं है, इसलिए कृपया मेरी फ़िल्मों का बॉयकॉट न करें.''

अक्षय कुमार की 'रक्षा बंधन' भी अगले हफ़्ते की 11 तारीख़ को रिलीज़ हो रही है.

वहीं अक्षय कुमार की आ रही फ़िल्म रक्षाबंधन का विरोध आख़िर क्यों हो रहा है, इसे बता पाना मुश्किल है. अक्षय कुमार हिंदू राष्ट्रवादियों को पसंद आनेवाली कुछ हिंदी फ़िल्में बनाने वाले भारत के भरोसेमंद अभिनेताओं में से एक हैं.

लेकिन सोशल मीडिया की कई पोस्टों में इस फ़िल्म की एक स्क्रीनराइटर कनिका ढिल्लन को लेकर हिंदू राष्ट्रवादी आक्रामक हैं. असल में सोशल मीडिया पर ​कनिका ढिल्लन कथित गोरक्षकों की ओर से 'लोगों की लिन्चिंग' की अक्सर आलोचना करती रही हैं.

कई लोग अक्षय कुमार के उस ट्वीट को लेकर उनकी फ़िल्म को निशाना बना रहे हैं, जिसमें उन्होंने मंदिरों में दूध बर्बाद किए जाने की आलोचना की थी. वहीं कई लोग उनकी 2012 में आई फ़िल्म 'ओ माई गॉड' को लेकर भी निशाना बना रहे हैं, जिसमें कई धार्मिक कर्मकांडों की आलोचना की गई थी.

फ़िल्म आलोचक उदय भाटिया कहते हैं, ''यह सच है कि फ़िल्मों को ऑनलाइन 'ब्लैकलिस्ट' करने की अपीलों में ख़ासी वृद्धि हुई है. लेकिन अक्सर ऐसी अपीलें स्वाभाविक नहीं होतीं और ये दक्षिणपंथी एजेंडे को आगे बढ़ाती हैं.''

भाटिया के अनुसार, ''बॉयकॉट की ऐसी अपील प्राय: फ़िल्म या उसके एक्टर की वजह से जनभावना को आहत करने वाली कुछ चीज़ों के आसपास घूमती हैं.''

वे कहते हैं कि ऐसा होना विडंबना ही है क्योंकि हिंदी फ़िल्में अपने दर्शकों को ख़ुश करने के लिए ख़ास जतन करती हैं.

इस साल की बड़ी हिट फ़िल्मों में शामिल रही 'द कश्मीर फ़ाइल्स' 1990 में कश्मीर घाटी से भगाए गए कश्मीरी पंडितों के मुद्दे पर बनाई गई. इस फ़िल्म ने दर्शकों के बीच सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को काफ़ी बढ़ावा दिया.

द कश्मीर फ़ाइल्स

सौम्या राजेंद्रन ने अप्रैल में एक आलेख में लिखा, ''बॉलीवुड में फ़िल्म निर्माताओं के बीच राष्ट्रवाद, हिंदू सम्मान, ऐतिहासिक हिंदू आइकन, अतीत में हिंदुओं को पहुँचे दुख और समकालीन सैनिक क्षमता, लोकप्रिय विषय बन चुके हैं.''

पिछले कुछ सालों में, बीजेपी की दक्षिणपंथी हिंदू विचारधारा के समर्थन और विरोध को लेकर भारत का मनोरंजन उद्योग साफ़ तौर पर बँटा हुआ दिखा है.

बॉलीवुड के ज़्यादातर स्टार नुक़सान होने के डर से राजनीतिक मसलों पर अपनी राय अपने तक ही सीमित रखते हैं. वहीं जो निर्माता विवादास्पद विषयों पर फ़िल्में बनाते हैं, उन्हें बड़े स्तर पर ट्रोलिंग कैंपेन और कई बार तो पुलिस केस का भी सामना करना पड़ता है.

जून 2020 में सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद बॉलीवुड के तमाम कलाकारों को भाई-भतीजावाद के आरोपों का सामना करना पड़ा. हालांकि कई लोगों ने इसमें कुछ सच्चाई मानते हुए कहा कि ऐसा केवल फ़िल्मी दुनिया में ही नहीं हो रहा, दूसरे सेक्टरों में भी ऐसी प्रवृत्ति देखी जाती है.

सोशल मीडिया ट्रोलिंग के असर और फ़िल्म इंडस्ट्री पर होने वाले हमले, करण जौहर के लोकप्रिय टॉक शो 'कॉफ़ी विद करण' के हालिया सीज़न में लगातार चर्चा के विषय रहे हैं.

इस शो के मेज़बान और निर्माता-निर्देशक करण जौहर ने इसके एक एपिसोड में कहा, "एक इंडस्ट्री के रूप में हमें बदनाम किया गया. हमें दो साल तक काल-कोठरी में रखा गया."

वैसे फ़िल्म इंडस्ट्री के लोग अब अपनी छवि को लेकर बहुत सावधान हो गए हैं. वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि बॉयकॉट की अपील का बहुत ज़्यादा असर नहीं होने वाला.

उदय भाटिया कहते हैं, "फ़िल्म इंडस्ट्री के लोगों के बारे में सच्ची राय शायद ही कभी दिखती है. अक्षय कुमार शायद आज सबसे लोकप्रिय हिंदी फ़िल्म स्टार हैं, फिर भी उनकी फिल्म रक्षा बंधन का बहिष्कार करने की अपील हाल में ट्रेंड कर रही थी."

वहीं फ़िल्म कारोबार की जानकारी रखने वाले तरण आदर्श, आमिर ख़ान के अभिनय और निर्माण वाली फ़िल्म 'दंगल' और 'पद्मावत' जैसी फ़िल्मों की सफलता के बारे में बताते हुए कहते हैं कि इन फ़िल्मों को भी विरोध का सामना करना पड़ा था.

वे कहते हैं, "हर कोई बहुत सतर्क हो गया है. लेकिन सोशल मीडिया ट्रोलिंग किसी फ़िल्म को प्रभावित करता है या नहीं, इसे समझने के लिए आपको फ़िल्म की रिलीज़ का इंतज़ार करना पड़ता है. दर्शकों की प्रतिक्रिया से आपको इसका पता चलेगा."

आदर्श कहते हैं कि नकारात्मक अभियानों से फ़िल्में लोगों के बीच चर्चित हो जाती हैं और लोगों की भावनाएं जग जाती हैं. वे कहते हैं, "आख़िरकार यदि कोई फ़िल्म दर्शकों को पसंद है, तो उसे देखने से रोका नहीं जा सकता."

उदय भाटिया कहते हैं कि बॉलीवुड में हर सफलता का श्रेय केवल 'अच्छे कॉन्टेंट' को नहीं दिया जा सकता, लेकिन ये ज़रूर है कि अब भी दर्शक ही राजा हैं, ट्रोलर नहीं.

हालांकि ऑनलाइन स्पेस के बहुत ज़हरीले हो जाने से हाल फ़िलहाल में इस बात की बिल्कुल भी संभावना नहीं है कि सोशल मीडिया के साथ बॉलीवुड के कठिन रिश्ते सहज हो जाएंगे.