रेज्ड बेड टेक्निक से राजेंद्र अरहर-1 का चंपारण में हो रहा उत्पादन

भारत में विश्व के कुल क्षेत्रफल के लगभग 65% क्षेत्र में अरहर की खेती की जाती है. अरहर, चना के बाद दूसरी प्रमुख दलहनी फसल है. अरहर की खेती असिंचित एवं सिंचित दोनों दशाओं में की जाती है, लगभग 85% अरहर की खेती असिंचित खेती के रूप में की जाती है. केवल 15% सिंचित क्षेत्र में की जाती है. अरहर की उन्नतशील प्रजातियों की औसत उत्पादकता 10 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. केंद्र के मृदा विशेषज्ञ आशीष राय की निगरानी में राजेंद्र अरहर-1 नामक उन्नत प्रजाति का बीज उत्पादन रेज्ड बेड तकनीक जिसे कुंड और नाली विधि भी कहते हैं से किया जा रहा है.

डॉ. आशीष राय के अनुसार बदलती हुई जलवायु में किसान भाइयों का स्थानीय जलवायु, मिट्टी एवं परिस्थितियों के आधार पर उन्नतशील प्रजाति के बीज का चुनाव करना नितांत आवश्यक हो जाता है और उन्नतशील प्रजातियों का चुनाव एवं वैज्ञानिक सस्य क्रियाओं का प्रयोग करके अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं.

बीज दर: 12-15 किलोग्राम शुद्ध प्रमाणित बीज पर्याप्त रहता है. बुवाई के 20 से 25 दिन बाद सघन पौधों को निकालकर 20-25 सेंटीमीटर की दूरी कर देनी चाहिए.

बुवाई की विधि: शीघ्र पकने वाली प्रजातियों को मध्य जून तक बुवाई सिंचित दशा में कर देनी चाहिए. जिससे गेहूं की बुवाई 25 नवंबर तक की जा सके. अरहर की फसल को लाइन से लाइन की दूरी 45-60 cm की दूरी पर मेड़ों पर लगाया जाए तो अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है. अरहर काटने के बाद गरमियों में खेेत को खुला छोड़कर रखते हैं तथा खरीफ में धान की सीधी बुवाई सीडड्रिल के द्वारा करने से समय से बुवाई हो जाती है तथा उपज अधिक मिलती है. खाद एवं बीज एक साथ उचित गहराई पर गिरते हैं.

बुवाई का समय: उत्तर भारत में बुवाई का उपयुक्त समय सामान्य रूप से 15 जून से 15 जुलाई के मध्य का होता है.

बीज उपचार: बीज की बुवाई करने से पहले बीज का उपचार करना बहुत ही लाभकारी होता है. बुवाई से पहले बीज को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए. राइजोबियम कल्चर एक पैकेट, 10 किलोग्राम बीज को उपचारित करने के लिए पर्याप्त है.

खाद का प्रयोग: कंपोस्ट अथवा गोबर की सड़ी खाद 05-10 टन प्रति हेक्टेयर अवश्य उपयोग में लाएं. कंपोस्ट अथवा गोबर खाद कम से कम 20 से 25 दिन पहले खेत में डालकर मिट्टी में मिला दे, तभी उस फसल के लिए अधिक उपयोगी होगी. रासायनिक उर्वरक नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश को 20:50:40 के अनुपात में प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करें. नत्रजन फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के पहले अंतिम जुताई के समय प्रयोग करें.

खरपतवार नियंत्रण: बुवाई के 1 माह के अंदर पहले निराई गुड़ाई करनी चाहिए तथा दूसरी पहली के 20 दिन बाद करना चाहिए. रासायनिक विधि से भी खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है.

सिंचाई: यदि समय पर वर्षा न हो तो अथवा कम नमी की अवस्था में एक सिंचाई फलियां बनने के समय अक्टूबर माह में अवश्य की जानी चाहिए. केंद्र के कीट विशेषज्ञ डा जीर विनायक के अनुसार फली भेदक कीट अरहर की मुख्य कीट है इसकी गिंडारे फलियों के अंदर घुसकर नुकसान पहुंचाती है. क्षतिग्रस्त फलियों में छीद्र दिखाई देते हैं, कीटनाशक का छिड़काव फसल में फूल आने से पूर्व करना चाहिए. यदि आवश्यक हो तो 15 दिन बाद पुनः एक बार छिड़काव करना चाहिए.

कटाई: सामान्य रूप से जब पौधे की पत्तियां गिरने लगें एवं फलियां सूखने पर भूरे रंग की पड़ जाए तब फसल की कटाई करनी चाहिए. खलिहान में 8-10 दिन तक धूप में सुखाकर गहाई की जाती है. बीजों को अच्छी तरह सुखाकर भंडारित करना चाहिए.

पैदावार: उन्नत उत्पादन विधियों को अपनाकर असिंचित दशा में 12 से 16 क्विंटल एवं सिंचित दशा में 20 से 25 क्विंटल औसत उपज प्राप्त की जा सकती है. बीज उत्पादन में केंद्र के कर्मी संतोष कुमार रूपेश कुमार, चुन्नु कुमार फार्म पर सहयोग और तकनीकी सहायता प्रदान कर रहे हैं.

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