निमाड़ में हुए दो अभिनव प्रयोगों से सफेद सोने की खेती को मिलेगी गति

KRISHAK JAGAT | National Agriculture Hindi Newspaper

  • इंदौर (विशेष प्रतिनिधि)

22 जनवरी 2023,  निमाड़ में हुए दो अभिनव प्रयोगों से सफेद सोने की खेती को मिलेगी गति – मध्यप्रदेश का खरगोन जिला कपास उत्पादन में अग्रणी है, इसीलिए यहाँ कपास उत्पादन को सफ़ेद सोने की खेती कहा जाता है। यहाँ के प्रगतिशील किसान उन्नत तकनीक को अपनाकर हमेशा कुछ नया करते रहते हैं। इसी क्रम में खरगोन जिला मुख्यालय से मात्र 20 किमी. दूर गोगांवा तहसील के बैजापुरा के उन्नत किसानों के समूह (एफपीओ ) ने नवाचार के रूप में कपास की खेती में क्षेत्र में पहली बार दो ऐसे अभिनव प्रयोग किए हैं, जिनसे निकट भविष्य में कपास की खेती को गति मिलेगी। ये दो प्रयोग हैं उच्च घनत्व रोपण प्रणाली (एचडीपीएस) से कपास की बुवाई और दूसरा कपास के उत्पादन में शत प्रतिशत मशीनीकृत कृषि पद्धति का उपयोग। इन दोनों प्रयोगों से न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि मजदूरों की समस्या से भी मुक्ति मिलेगी।

कपास का रकबा अधिक

गोगांवा फार्मर प्रोड्यूसर आर्गेनाइजेशन के डायरेक्टर श्री मोहन सिंह सिसौदिया ने कृषक जगत को बताया कि दो वर्षों के निरंतर प्रयासों  के बाद किसानों को एकत्रित कर नाबार्ड के सहयोग से किसान उत्पादक समूह बनाया। श्री सिसोदिया ने कहा कि विश्व के 40 कपास उत्पादक देशों में भारत में कपास का रकबा सबसे अधिक है, लेकिन उत्पादकता के मामले में हम सबसे पीछे हैं। जबकि जलवायु और भूमि के दृष्टिकोण  से हम बेहतर हैं। इसके लिए विभिन्न स्तरों पर अध्ययन के बाद  27 किसानों के साथ 248 एकड़ रकबे में सघन बुवाई से कपास लगाया गया। जबकि सामान्य विधि में कपास के बीज को एक निश्चित दूरी पर चोपते अर्थात भूमि में निश्चित गहराई में लगाते हैं। आमतौर पर सघन विधि का प्रयोग गेहूं, सोयाबीन, सरसों आदि की बुवाई में किया जाता है। इस सघन विधि में बीज का खर्च 20 त्नअवश्य बढ़ जाता है, लेकिन कीटनाशक और उर्वरक का खर्च 50 त्न कम हो जाता है। खरपतवार भी कम होता है। लागत कम होने के साथ ही उत्पादन भी बढ़ता है। सघन पद्धति  से हमें अधिकतम उत्पादन 12 क्विंटल प्रति एकड़ मिला। जबकि सामान्य विधि में अधिकतम उत्पादन 5 क्विंटल ही मिलता है। हमारे  एफपीओ से जुड़े 27 किसानों ने इसी विधि से इस वर्ष की कपास की फसल में औसत उत्पादन 9 क्विंटल प्रति एकड़ का लिया है। जो 4  क्विंटल प्रति एकड़ अधिक है। श्री सिसोदिया ने दूसरे प्रयोग की चर्चा करते हुए कहा कि कपास उत्पादन में शत प्रतिशत मशीनों का उपयोग  किया गया।

कपास की बुवाई सीडर से की गई और कीटनाशक छिडक़ाव भी स्प्रेयर के द्वारा किया गया। इसके बाद कपास की चुनाई भी कॉटन पिकर मशीन इस्तेमाल की गई। इसके अलावा कल्टीवेशन भी मशीनों से ही किया गया। इस नए प्रयोग से निमाड़ में कपास की चुनाई में आ रही मजदूरों की समस्या से भी मुक्ति मिलेगी। निमाड़ में हुए इन दो अभिनव प्रयोगों से निश्चित ही कपास की खेती को गति मिलेगी।

एफपीओ गठन के लिए 5 बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स

नाबार्ड के जिला विकास प्रबंधक (डीडीएम) श्री विजेंद्र पाटिल ने  कृषक जगत को एफपीओ  की प्रक्रिया बताए हुए कहा कि सामान्य तौर पर किसी भी एफपीओ गठन के लिए 5 बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स, 5 प्रोमोटर्स और किसानों को जोडऩे के लिए मोबिलाईजेशन राशि प्रदान की जाती है। इसके बाद कंपनीज़ एक्ट के तहत एफ़पीओ रजिस्ट्रेशन के लिए, विभिन्न  लाइसेन्स जैसे बीज, उर्वरक, जीएसटी इत्यादि के लिए राशि दी जाती है। एफ़पीओ के लिए एक सीईओ भी नियुक्त किया जाता है। गोगांवा फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी के लिए वर्ष 2020 से 23 के लिए 11.16 लाख रुपये की ग्रांट स्वीकृत हुई थी। इस एफपीओ के एक सदस्य को नाबार्ड के लखनऊ स्थित  बर्ड (बैंकर्स इंस्टीट्यूट ऑफ रूरलडेवलपमेंट) में एग्री एक्सपोर्ट के लिए प्रशिक्षण दिया गया। इस एफपीओ को एपीडा का इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट कोड और फार्म कनैक्ट पोर्टल से भी जोड़ा गया है,  ताकि आगे चल कर एफ़पीओ स्वयं कृषि उत्पाद निर्यात कर सके। जैसे जैसे एफ़पीओ की गतिविधि आगे बढ़ती है, वैसे -वैसे नाबार्ड द्वारा स्वीकृत की गई  ग्रांट का भुगतान किश्तों में किया जाएगा। 

नाबार्ड द्वारा मार्गदर्शन       

श्री पाटिल ने ज़ोर देकर कहा कि कृषक उत्पादक संगठन  (एफ़पीओ) के लिए सबसे महत्वपूर्ण है, व्यावसायिकता और सामूहिक निर्णय प्रणाली। इसके लिए बीओडी की मासिक बैठक करना, एफ़पीओ की वार्षिक आमसभा करना, साथ ही कंपनी का नियमित रूप से ऑडिट, लीगल कम्प्लायंस एवं बिजऩेस प्लान बनाना जरूरी होता है। इसीलिए गोगांवा एफपीओ में इन बातों को सुनिश्चित करने के लिए नाबार्ड भोपाल क्षेत्रीय कार्यालय के उच्च अधिकारी एवं डीडीएम द्वारा समय-समय पर मार्गदर्शन किया गया। एफपीओ में व्यावसायिकता बनाए रखने के लिए नाबार्ड द्वारा सदस्य संख्या, शेयर कैपिटल, टर्नओवर जैसे मापदंडों पर विशेष ध्यान दिया      गया है।

साथ ही, एफपीओ को जिले के कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विभाग, उद्यानिकी विभाग, बैंक इत्यादि से जोड़ा गया है, इससे एफपीओ ज्यादा से ज्यादा कृषकों तक शासकीय योजनाओं एवं सहयोग पहुँचाने का माध्यम बन गया है।

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