यूरोप में उगने वाले गेहूं ने अब बढ़ाई टेंशन, क्या आने वाले समय में फिर बढ़ेंगे भाव ?

साल 2022 में रूस यूक्रेन संकट की वजह से गेहूं की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला था और भारत में भी इसका असर देखने को मिला. उम्मीद की जा रही थी कि साल 2023 में स्थितियों में सुधार देखने को मिलेगा लेकिन यूरोप में उगने वाले गेहूं ने एक बार फिर टेंशन बढ़ा दी है. दरअसल एक रिपोर्ट के मुताबिक एक फफूंद रोग बढ़ रहा है, जिसे फ्यूजेरियम हेड ब्लाइट (एफएचबी) कहा जाता है, जो गेहूं की फसलों को संक्रमित कर सकता है और अनाज को विषाक्त पदार्थों से दूषित कर सकता है. इस कारण से इसे इंसानों के इस्तेमाल लायक नहीं माना जाता है क्योंकि ये तथाकथित मायकोटॉक्सिन जिसे आमतौर पर ‘वोमिटॉक्सिन’ कहा जाता है – मानव और पशुओं के स्वास्थ्य के गंभीर खतरा बन सकते हैं.

बाथ विश्विविद्यालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक ये पाया गया है कि एफएचबी मायकोटॉक्सिन पूरे यूरोप में भोजन और पशु आहार के लिए उत्पादित गेहूं में व्यापक तौर पर मौजूद हैं. रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि मायकोटॉक्सिन का खतरा – विशेष रूप से यूरोप के दक्षिण में – समय के साथ बढ़ रहा है

रिपोर्ट में मुताबिक अध्ययन में शामिल किए गए प्रत्येक यूरोपीय देश में वोमिटॉक्सिन मौजूद था, और कुल मिलाकर यह भोजन के लिए नियत किए गए सभी गेहूं के नमूनों में से आधे में पाया गया. यूके में, 2010 और 2019 के बीच उत्पादित खाद्य गेहूं के 70 प्रतिशत में वोमिटॉक्सिन पाया गया था. हालांकि यूरोपीय गेहूं में दर्ज किया गया वोमिटॉक्सिन लगभग सभी (95 प्रतिशत) में सरकार के द्वारा तय सुरक्षित सीमा के अंदर ही था. रिपोर्ट में कहा गया है कि भले ही मौजूदा आंकडों में ये मायकोटॉक्सिन सुरक्षित सीमा के अंदर ही हो फिर भी हमारे भोजन में वोमिटॉक्सिन की व्यापक उपस्थिति चिंता का विषय है. फिलहाल ऐसी कोई रिसर्च नहीं हुई है कि अगर सुरक्षित सीमा के अंदर भी मायकोटॉक्सिन को लंबी समय तक लिया जाए तो इसका इंसानों पर क्या असर पड़ेगा.

इस टॉक्सिन की वजह से यूरोप की एग्री इकोनॉमी पर भी बुरा असर पड़ने की संभावना जताई गई है.दरअसल यूरोप में भोजन के लिए उत्पादित गेहूं के 5 प्रतिशत में वोमिटॉक्सिन सीमा से अधिक था और साल 2010 से 2019 के बीच यह 7.5 करोड़ टन गेहूं के बराबर था. आमतौर पर टॉक्सिन अधिक होने पर नियमों के अनुसार उसे पशु चारे में बदल दिया जाता है लेकिन इससे किसानों को काफी नुकसान होता है क्योंकि इंसानों के खाद्य के मुकाबले पशु चारे की कीमत काफी कम मिलती है. रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि अगर सभी 5 प्रतिशत गेहूं की बिक्री पशु चारे की दर पर भी की गई हो तो इस दौरान किसानों को 300 करोड़ यूरो (26 हजार करोड़ रुपये) का नुकसान हो चुका होगा. वहीं गेहूं की सप्लाई में भी कमी आने से इसका असर कीमतों पर भी पड़ा होगा.

रिपोर्ट में कहा गया है कि माइकोटॉक्सिन का स्तर लगातार बढ़ रहा है और 2018 और 2019 के दौरान इसकी मौजूदगी सबसे ज्यादा देखने को मिली थी. यानि आने वाले समय में आशंका है कि पहले से ज्यादा गेहूं इंसानों को होने वाली सप्लाई से हटाना पड़ सकता है. खास बात है कि गेहूं के मुकाबले मक्का एफएचबी के लिए एक अतिसंवेदनशील फसल है. यानि इसका असर दूसरी फसलों पर देखने को मिल सकता है.

(पीटीआई )

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