गेहूं की विभिन्न अवस्थाओं में सिंचाई से होता है फायदा

KRISHAK JAGAT | National Agriculture Hindi Newspaper

10 दिसम्बर 2022, भोपाल: गेहूं की विभिन्न अवस्थाओं में सिंचाई से होता है फायदा – रबी फसलों में गेहूँ को ही सबसे अधिक सिंचाई से फायदा होता है। देशी उन्नत जातियों अथवा गेहूँ की ऊंची किस्मों की जल की अवश्यकता 25 से 30 से.मी. है। इन जातियों में जल उपयोग की दृष्टि से तीन क्रांतिक अवस्थाएं होती हैं। जो क्रमश: कल्ले निकलने की अवस्था (बुआई के 30 दिन बाद) पुष्पावस्था (बुआई के 50 से 55 दिन बाद) और दूधिया अवस्था (बुआई के 95 दिन बाद) आदि है।

इन अवस्थाओं में सिंचाई करने से निश्चित उपज में वृद्धि होती है। प्रत्येक सिंचाई में 8 से.मी. जल देना आवश्यक है। बौनी गेहूँ की किस्मों को प्रारंभिक अवस्था से ही पानी की अधिक आवश्यकता होती है-क्राउन रूट (शिखर या शीर्ष जड़ें) और सेमीन जडें़ की अवस्था में शिखर जड़ोंं से पौधों में कल्लों का विकास होता है जिससे पौधों में बालियां ज्यादा आती हैं और फलस्वरूप अधिक उपज मिलती है। सेमीनल जडें़ पौधों को प्रारंभिक आधार देती हैं। अत: हर हालत में बुआई के समय खेत में नमी काफी मात्रा में हो। पलेवा देकर खेत की तैयारी करके बुआई करने पर अच्छा अंकुरण होता है। इन जातियों को 40 से 50 से.मी. जल की आवश्यकता होती है। और प्रति सिंचाई 6 से 7 से.मी. जल देना जरूरी है। अगर दो सिंचाइयों की सुविधा है तो पहली सिंचाई बुआई के 20-25 दिनों बाद प्रारंभिक जड़ों के निकलने के समय करें और दूसरी सिंंचाई फूल आने के समय यदि तीन सिंचाइयाँ करना संभव है तो पहली सिंचाई बुआई के 20 से 25 दिन बाद (शिखर जडें़ निकलने के समय), दूसरी  गांठों के पौधों में बनने के समय (बुआई के 60-65 दिन बाद) और तीसरी सिंचाई पौधों में फूल आने के बाद करें।

जहां चार सिंचाईयों की सुविधा हो वहां, पहली सिंचाई बुआई के 21 दिन बाद शिखर जड़ों के निकलते समय, दूसरी पौधों में कल्लों के निकलते समय (बुआई के 40 से 45 दिनों बाद), तीसरी बुआई के 60-65 दिनों बाद (पौधों में गांठें बनते समय) और चौथी सिंचाई पौधों में फूल आने के समय करें। चौथी और पाँचवी सिंचाई विशेष लाभप्रद सिद्ध नहीं होती है। इनको उसी समय करें जब मिट्टी में पानी की संचय की शक्ति कम हो। बलुई या बलुई दोमट मिट्टी में इस सिंचाई की जरूरत होती है।

पिछेती गेहँू में पहली पांच सिंचाइयां 15 दिनों के अंतर से करें। फिर बालें निकलने के बाद यह अंतर 9 से 10 दिन का रखें। पिछेती गेहूँ की दैहिक अवस्था पिछड़ जाती है और बालों का निकलना और दानों का विकास तो ऐसे समय पर होता है, जबकि वाष्पीकरण तेजी से होता है और ऐसी दशा में खेत में नमी की कमी का दोनों के विकास पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है, और इसी लिए दाना सिकुड़ जाता है। इसीलिए देर से बोये गये गेहूँ में जल्दी सिंचाई कम दिनों के अंतर से जरूरी है। सामान्यत: गेहँू की फसल में सिंचाई मुख्यत: बार्डर विधि में 60 से 70 प्रतिशत सिंचाई क्षमता मिल जाती है और क्यारी विधि की तुलना में 20-30 प्रतिशत बचत पानी की होने के साथ-साथ एवं श्रम की बचत भी होती है। जहां ढाल खेत की दोनों दिशाओं में हो वहां क्यारी पद्धति से सिंचाई करना लाभदायक है, जहाँ ट्यूबवेल द्वारा पानी दिया जाता है, वहां यह विधि अपनाई जाती है। जहाँ पर ज्यादा हल्की भूमि अथवा उबड़-खाबड़ हो वहाँ सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति सबसे उपयुक्त होती है। इस विधि में 70-80 प्रतिशत सिंचाई क्षमता मिल जाती है।

महत्वपूर्ण खबर: कपास मंडी रेट (08 दिसम्बर 2022 के अनुसार)

(नवीनतम कृषि समाचार और अपडेट के लिए आप अपने मनपसंद प्लेटफॉर्म पे कृषक जगत से जुड़े – गूगल न्यूज़,  टेलीग्राम )

The post गेहूं की विभिन्न अवस्थाओं में सिंचाई से होता है फायदा appeared first on Krishak Jagat (कृषक जगत).

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *